शरीर के सप्तचक्र जाग्रत होने पर मिलती है आध्यात्मिक उन्नति

 


चक्र एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है पहिया। सात चक्र हैं और उनमें से प्रत्येक में विशेष प्रकार की ऊर्जा निहित होती है जो तंत्रिका तंत्र और अन्य अंगों को भी नियंत्रित करती है । शारीरिक और भावनात्मक अभिव्यक्तियों के साथ-साथ प्रत्येक चक्र का अपना आध्यात्मिक गुण होता है। 

प्रत्येक चक्र में ऊर्जा का प्रवाह होता है जो चक्र जागृत अथवा बैलेंस होता है उसमें ऊर्जा का प्रवाह होता है तथा जो चक्र बैलेंस नहीं होता उसमें कम ऊर्जा का प्रवाह होता है शरीर में मौजूद किसी भी प्रकार की मानसिक तथा शारीरिक समस्या को इन चक्रों को जागृत करके ठीक किया जा सकता है अगर कोई चक्र बैलेंस नहीं होता है तो उस चक्र से जुड़े शारीरिक अंगों में दिक्कत आनी शुरू हो जाती है किस चक्र से कौन सा अंग जुड़ा होता है और कौन सा चक्र किस कार्य के लिए उत्तरदाई होता है तथा हमारे शरीर में कहां स्थित होता है इनके क्या प्रभाव होते हैं इनके असंतुलन से क्या होता है एवं इनको संतुलित करने की क्या विधियां या उपाय हैं हम इनके बारे मैं जानेंगे प्रमुखतः ७ चक्र होते हैं। 

1.        मूलाधार चक्र

2.       स्वाधिष्ठान चक्र

3.       मणिपुर चक्र

4.       अनाहत चक्र

5.       विशुद्ध चक्र

6.       आज्ञाचक्र

7.       सहस्रार चक्र



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